एनीमिया मुक्त भारत के संकल्प को साकार कर रहा सीतामढी़

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जिला संवाददाता की रिपोर्ट.

– आंगबाड़ी केंद्रों पर बच्चों को दी जा रही है आयरन की गोली

– कोरोना काल में स्कूली बच्चों के घर पर जाकर आयरन टैबलेट दे रहीं आशा

सीतामढ़ी। 12 अगस्त

एनीमिया यानी खून की कमी हमारे देश में एक गंभीर लोक स्वास्थ्य समस्या बन गई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आधार पर देश की 60 प्रतिशत आबादी इस बीमारी से ग्रस्त है। रोग की भयावहता को देखते हुए सरकार ने एनीमिया मुक्त भारत का जो संकल्प लिया है, उसे साकार करने में सीतामढ़ी जिला भी बड़ी भूमिका निभा रहा है। जिला प्रतिरक्षण पदाधिकारी सह एनीमिया मुक्त भारत कार्यक्रम के नोडल ऑफिसर डॉ एके झा ने बताया कि राज्य स्वास्थ्य समिति के कार्यपालक निदेशक के निर्देशानुसार जिले में एनीमिया मुक्त भारत कार्यक्रम को एक अभियान के रूप में चलाया जा रहा है। कोरोना काल में भी इसकी रफ्तार धीमी नहीं हुई है। इस अनुपूरक कार्यक्रम के अलावा खानपान में सुधार के लिए भी बच्चों के अभिभावकों को जागरूक किया जा रहा है।

घर-घर जाकर दवा पहुंचा रहीं आशा :

डॉ झा ने बताया कि कोरोना संक्रमण के खतरे को देखते हुए अभी सभी स्कूल बंद हैं। ऐसे में आशा बच्चों के घर पर जाकर आयरन की गोली उपलब्ध करा रही हैं। आंगनबाड़ी केंद्रों पर 10 से 19 वर्ष की ऐसी किशोरियां, जो स्कूल नहीं जाती हैं, उन्हें सेविका के द्वारा नीले रंग की गोली दी जा रही है। स्कूल आधारित कार्यक्रम के तहत पहली से पांचवीं कक्षा के बच्चे-बच्चियों को गुलाबी रंग की गोली दी जा रही है। छठी से 12वीं कक्षा के किशोर-किशोरियों को नीले रंग की गोली दी जा रही है। अभी आशा बच्चों के घर जाकर दवा बांट रही हैं।

06 से 59 माह के बच्चों के लिए है आयरन सीरप :

06 से 59 माह के बच्चों को आयरन सीरप पिलानी है। एक ख़ुराक में 1 मिलीलीटर यानी 8-10 ख़ुराक प्रति माह बच्चे को देनी होती है। सभी आशा को स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से सिरप की 50 मिलीलीटर की बोतलें आवश्यक मात्रा में दी जाती हैं। प्रथम दो सप्ताह में आशा खुद बच्चों को दवा पिलाकर मां को सिखाने का प्रयास करती हैं। ऑटो डिस्पेंसर से दवा की सही मात्रा देने में सुविधा होती है। इस आयरन सिरप में एक ऑटो डिस्पेंसर लगा होता है, जिसे दबाने के बाद एक बार में निश्चित मात्रा में(1 मिलीलीटर) ही दवा बाहर आती है। प्रथम दो सप्ताह के बाद की खुराक मां द्वारा स्वयं बच्चे को पिलाने तथा अनुपूरण कार्ड में निशान लगाने के लिए प्रेरित किया जाता है।

दवा पिलाते समय इन बातों पर ध्यान दें :

दवा पिलाने वक्त बोतल को अच्छी तरह से हिला लें, दूध के साथ बच्चे को सिरप नहीं दें, दवा पिलाने के समय बोतल पर दर्ज एक्सपायरी डेट जरूर देख लें, खाली पेट बच्चों को सिरप नहीं दें, रक्त संबंधी गंभीर समस्या होने पर चिकित्सक की राय के बाद ही सिरप दें।

शरीर के हरेक हिस्से में ऑक्सीजन भेजता है
हीमोग्लोबिन :

डॉ झा ने बताया कि बच्चे में 6 माह तक लौह-तत्व ( हीमोग्लोबिन) का प्राकृतिक रूप से संग्रहण रहता है, लेकिन इसके बाद बच्चे को लौह-तत्व की जरूरत होती है। शरीर में मौजूद हीमोग्लोबिन ही बाहर से ऑक्सीजन अवशोषित कर शरीर के हरेक हिस्से में भेजने में सहयोग करता है। शरीर में ऑक्सीजन की प्रचूर मात्रा से ही बच्चे का सही शारीरिक और मानसिक विकास संभव हो पाता है। इसे ध्यान में रखते हुए एनीमिया मुक्त भारत कार्यक्रम के तहत 6 माह से 59 माह तक के बच्चों को सप्ताह में दो बार आयरन फोलिक एसिड सिरप देने का प्रावधान किया गया है।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे 4 के अनुसार जिले की स्थिति :

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे 4 के अनुसार जिले में 6 से 59 महीने के 69.0 प्रतिशत बच्चे, 15 से 49 साल की 59.1 प्रतिशत महिलाएं एवं 15 से 49 साल की 67.3 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं एनिमिक हैं।