अब स्वदेशी तकनीक एलिसा किट से होगी फ्रंटलाइन वर्कर्स के कोरोना की जांच

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वैशाली जिला संवाददाता कौशल किशोर सिंह की रिपोर्ट.

– अभी आरटी-पीसीआर, रैपिड एंटीजन टेस्ट और ट्रूनेट मशीन से होती है जांच
– तुल्नात्मक तौर पर सस्ती है एलिसा किट से टेस्ट
– पूर्व में हो चुके संक्रमण की का भी लगेगा पता

वैशाली । 7 अगस्त
कोरोना के बढ़ते संक्रमण और उसके जांच से संबंधित कार्यवाई हेतु आईसीएमआर के द्वारा स्वदेशी तकनीक से निर्मित एलिसा टेक्नोलॉजी से रैपिड एंटीबॉडी टेस्ट को मंजूरी मिल गयी है। जिसे स्वास्थ्य विभाग की तरफ से कोविड कार्य में लगे जिले के फ्रंट लाइन वर्कर्स, हेल्थकेयर वर्कर्स के साथ सरकारी कार्यालयों के कर्मी, बैंक एवं अन्य सार्वजनिक सेवाओं के कर्मियों की जांच की जाएगी। स्वास्थ्य विभाग के इस आदेश पर वैशाली के लिए 200 किट प्रदान किए गये हैं। इस जांच को पटना के आरएमआरआई में किया जाएगा। इस संबंध में आईसीएमआर ने कहा है कि ज्यादा खतरे वाले इलाके, कंटेनमेंट जोन और फ्रंटलाइन वर्कर्स और स्वास्थ्य कर्मचारियों पर ही इस किट का इस्तेमाल किया जाएगा।

कैसे करता है एलिसा किट काम

इस तकनीका का अविष्कार 1974 में किया गया था। ईएलआईएसए का मतलब है एंजाइम-लिंक्ड इम्यूनो-सोरबेंट एस्से। इस तकनीक का इस्तेमाल ये पता करने में लगाया जाता है कि क्या शरीर में इम्यून सिस्टम विशेष वायरस के खिलाफ लड़ने के लिए एंटीबॉडी बना पाया है या नहीं।
इस टेस्ट को एंजाइम-लिंक्ड इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये खून के सैंपल में एंटीबॉडी को पकड़ने में एंजाइम का इस्तेमाल किया जाता है। एक ईएलआईएसए किट दो तरह की एंटीबॉडी पर निर्भर करता है, पहला- इम्यूनोग्लोबुलिन जी और दूसरा इम्यूनोग्लोबुलिन एम।
इम्यूनोग्लोबुलिन जी संक्रमण के बाद वाले स्टेज पर विकसित हुई एंटीबॉडी को पकड़ती है और इम्यूनोग्लोबुलिन एम संक्रमण के पहली स्टेज पर विकसित एंटीबॉडी खोजती है। अभी सिर्फ इम्यूनोग्लोबुलिन जी टेस्ट किट को भारत में मंजूरी दी गई है।
क्यों जरुरी है एलीजा टेस्ट
आईसीएमआर के वैज्ञानिकों का मानना है कि एक नए वायरस से लड़ने के लिए सबसे ज़रूरी संक्रमण का स्तर पता लगाना होता है। जब तक वायरस का इलाज नहीं मिल जाता, तब तक आंकड़े ही दवाई की तरह काम करते हैं। इसी के आधार पर वैज्ञानिक और सरकार फैसले लेते हैं कि, उन्हें किस तरह के कदम उठाने हैं, क्या छूट देनी है, कहां- कितनी रियायत देनी है। कोरोना के संक्रमण के मामले में भी ठीक ऐसा ही है, यहां भी किसी भी तरह का फ़ैसला लेने के लिए आंकड़ों की बहुत ज़रूरत है। एलिसा किट से यह स्पष्ट होगा कि, किसके शरीर में संक्रमण पूर्व से हो चुका है और किस में संक्रमण होने की संभावना है। यह एक नई विधि है इससे शरीर के एंटीबॉडी की जांच की जायेगी।

सेरोलॉजिकल टेस्ट ही है एलीजा टेस्ट

इसमें मरीज की उंगली में सूई चुभोकर खून का सैंपल लिया जाता है, जिसका परिणाम 15 से 20 मिनट में आ जाता है। एंटीबॉडी टेस्ट को ही सेरोलॉजिकल टेस्ट कहा जाता है। यह जेनेटिक टेस्ट के मुकाबले काफी सस्ता होता है। रिवर्स- ट्रांसक्रिप्टेस रीयल टाइम पोलीमरेज चेन रिएक्शन (आरटी-पीसीआर) यानी जेनेटिक टेस्ट में नौ घंटे में रिजल्ट मिलता है। पीसीआर टेस्ट शुरुआती दौर में संक्रमण का पता तभी लगा सकता है। जब वायरस के संक्रमण से लड़ने के लिए शरीर में एंटीबॉडी डेवलप हो चुका हो। इसलिए एंटी बॉडी टेस्ट में जो पॉजिटिव आते हैं, उनमें संक्रमण का सही से पता लगाने के लिए जेनेटिक टेस्ट यानी पीसीआर टेस्ट के लिए भेजा जाता है।

हाई रिस्क जोन के लोगों की होगी जांच

पत्र में बताया गया है कि एलिसा टेस्ट का उपयोग डॉक्टर, नर्स एवं सहायक कर्मचारी, स्वास्थ्य कर्मी, फार्मासिस्ट, क्लर्क, थर्मल स्क्रीनिंग करने वाले, प्रेस रिपोर्टर, दैनिक कार्य करने वाले मजदूर, प्रवासी मजदूर, निगम कर्मचारी, एंबुलेंस ड्राइवर, बैंक कर्मी, डाक कर्मी, कूरियर स्टाफ, कैदी, टीवी मरीज, डायलिसिस मरीज की भी प्राथमिकता के आधार पर टेस्टिंग करनी है। बफर एवं कंटेंटमेंट जोन में भी जांच करनी हैं।