मृत कोरोना मरीज से नहीं फैलता कोरोना, डरे नहीं

0
205

जिला संवाददाता कौशल किशोर सिंह की रिपोर्ट.

 
• खांसने या छींकने से होता है कोरोना, सुरक्षित रुप से लपेटे डेड बॉडी से नहीं
• एक प्रक्रिया के तहत होता है शवों का निस्तारण

मुजफ्फरपुर, 22 जुलाई:
एसकेएमसी हॉस्पिटल में मंगलवार को हुई कोरोना से मौत पर उनके परिजनों की बेरुखी का मामला प्रकाश में आया है। जिसमें परिवार वालों ने शव को लेने से इंकार कर दिया था। बाद में अस्पताल प्रशासन ने राज्य स्वास्थ्य समिति के गाईडलाइन के अनुसार शव का अंतिम संस्कार किया। इस संबंध में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और राज्य स्वास्थ्य समिति ने शवों के निस्तारण पर दिशा-निर्देश भी दिए थे, जिसमें कुछ खास मानकों को ध्यान में रखकर शवों का अंतिम संस्कार की जानकारी दी थी। इस प्रक्रिया में शवों से कोरोना फैलने की संभावना बिल्कुल नगण्य है।

सतर्कता के साथ मृत कोरोना मरीज का कर सकते हैं दाह संस्कार:

इस संबंध में अपर मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी डॉ विनय कुमार शर्मा ने बताया कोविड 19 संक्रमित की मृत्यु के बाद शव के दाह संस्कार को लेकर परिजनों में व्याप्त डर को दूर करने में स्वास्थ्य विभाग पूरी सजगता से लगा हुआ है। साथ ही स्वास्थ्य महकमा अंतिम संस्कार से पूर्व की तैयारियों व दाह संस्कार स्थल तक शव को पहुंचाने तक के कार्यों को भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के दिये गये गाइडलाइंस के अनुसार कर रहा है और दाह संस्कार से संबंधित आवश्यक जानकारी देकर मृतक के परिजनों की आशंकाओं को दूर कर रहा है। गाइडलाइन में स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों द्वारा मृतक के परिजनों की भावनाओं का आदर करते हुए उनके आवश्यक काउंसलिंग प्रदान किये जाने के लिए कहा गया है।

गाइडलाइंस में यह बताया गया है कि कोविड-19 का प्रसार ड्रॉपलेट यानी खांसने व छींकते समय नाक से निकलने वाली बूंदों से होता है. यदि शव का निस्तारण पूरी सुरक्षात्मक उपायों के साथ किया जाता है तो अन्य लोगों में संक्रमण होने की संभावना नहीं होती है. राज्य स्वास्थ्य समिति ने भी दाह संस्कार को लेकर सभी सुरक्षात्मक उपाय बरतने के आदेश सिविल सर्जन सहित सभी मेडिकल संस्थानों के प्रमुखों को दिये हैं।

गाइडलाइंस की इन बातों का रखना है ध्यान:
• शव को हटाते समय स्वास्थ्यकर्मी पीपीई यानी पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्यूपमेंट का प्रयोग करें. इनमें पानी ना जाने वाले एप्रन, बड़े आकार का चश्मा, एन 95 मास्क व दस्ताना आदि शामिल हैं।

• मरीज के शरीर में लगी ट्यूब व कैथटर को सावधानी पूर्वक हटाया जाये. शव के किसी हिस्से में हुए जख्म या खून के रिसाव को ढंका जाये. उस हिस्से को एक प्रतिशत हाइपोक्लोराइट की मदद से कीटाणुरहित किया जाये. ऐसे हिस्सों की ड्रेसिंग कर शव को प्लास्टिक बैग में रखा जाना है और ध्यान रखना है शरीर से तरल पदार्थ का रिसाव बाहर न हो।

• यदि परिजन मृतक को देखना चाहते हैं तो स्टैंडर्ड प्रीकॉशन अपनाते हुए उन्हें शव का दर्शन कराया जाये. शव सिर्फ परिजनों को देना है अन्यथा उसे शवगृह ले जायें. संक्रमित शव को चार डिग्री सेल्सियस तापमान वाले चैंबर में रखना है।

• संक्रमित के इलाज के दौरान इस्तेमाल सभी चीजों को बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट नियमों के अनुसार ही नष्ट करना है।

• शव के अंतिम संस्कार में अधिक भीड़ भाड़ नहीं हो, इस बात का सभी को ध्यान रखना है. परिजनों व अंतिम संस्कार से जुड़े कार्यों को संपादित करने वाले ही मृतक की अंतिम यात्रा में शामिल हों।

• शव को नहलाना चूमना व गले लगाना आदि पर मनाही है. शव पर किसी प्रकार का लेप नहीं लगाना है. शवदाह गृह या कब्रिस्तान में भी अंतिम संस्कार कार्य में लगे लोग भी हाथ धोने, मास्क व दस्तानों आदि का इस्तेमाल करना है।

• अंतिम संस्कार के दौरान वैसी गतिविधियां जिनमें शव के संपर्क में नहीं आया जा सकता है, जैसे पवित्र जल का छिड़काव, मंत्रोच्चार या ऐसी अन्य कार्य किया जा सकता है।

• अंतिम संस्कार के बाद इस कार्य में लगे लोग व परिजनों को हाथ धोने व व्यक्तिगत साफ सफाई आदि के नियमों का पूरी तरह पालन करना चाहिए।

• शव को जलाने के बाद उसके राख से किसी प्रकार के संक्रमण का खतरा नहीं है. इसलिए इसे जमा किया जा सकता है।